आम लोगों में इस बात को लेकर जबरदस्त असंतोष है कि सरकारी सॉफ्टवेयर की गलती का खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ रहा है
कोलकाता। बंगाल में 23 साल बाद शुरू हुआ मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) कार्यक्रम अब तकनीक और भाषाई जटिलता के चक्रव्यूह में फंस गया है। बांग्ला भाषा की मिठास और कंप्यूटर की 'अंग्रेजी' कोडिंग के बीच छिड़ी इस ठंडी लड़ाई ने न केवल चुनाव आयोग की नींद उड़ा दी है, बल्कि आम मतदाताओं को भी नोटिस और सुनवाई के चक्कर काटने पर मजबूर कर दिया है।
बनर्जी और बंद्योपाध्याय जैसे उपनामों की अंग्रेजी स्पेलिंग में आए अंतर ने हजारों नामों के आगे लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी (तार्किक विसंगति) का रेड फ्लैग लगा दिया है। समस्या की जड़ वर्ष 2002 की मतदाता सूची में छिपी है, जो पूरी तरह बांग्ला लिपि में तैयार की गई थी। अब 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले जब इन आंकड़ों को डिजिटल रूप दिया जा रहा है, तो कंप्यूटर का ट्रांसलिटरेशन सॉफ्टवेयर गच्चा खा रहा है। अलीपुरद्वार के एक मतदाता मार्टिन खालखो का नाम जब अंग्रेजी में बदला गया, तो कंप्यूटर ने उसे कहीं ङ्ग्ररुङ्गह्र तो कहीं ्य॥्ररु्यह्र दर्ज कर दिया। बांग्ला में लिखे गए चटर्जी और चट्टोपाध्याय जैसे नामों को सॉफ्टवेयर अलग-अलग पहचान रहा है, जबकि व्यक्ति एक ही है।
हाल ही में उत्तर बंगाल से लौटे स्पेशल रोल ऑब्जर्वर सुब्रत गुप्ता ने आयोग को सौंपी अपनी रिपोर्ट में इस विसंगति का खुलासा किया है। उन्होंने बताया कि जमीनी स्तर पर मतदाताओं की कोई गलती नहीं है, लेकिन तकनीकी सॉफ्टवेयर नाम और उपनाम की स्पेलिंग में मामूली अंतर को धोखाधड़ी या त्रुटि मानकर उसे सुनवाई के लिए मार्क कर रहा है। इसके चलते राज्य भर में हजारों लोगों को बेवजह चुनाव कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं।
चुनाव आयोग के सूत्रों का कहना है कि अगर सुप्रीम कोर्ट के दखल से पहले ही विसंगतियों की सूची सार्वजनिक करने की अनुमति मिल जाती, तो इस अव्यवस्था को रोका जा सकता था। मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय का दावा है कि उन्होंने पहले ही आयोग को इस समस्या से अवगत कराया था। क्या 20 साल बाद जब दोबारा ऐसा पुनरीक्षण होगा, तब भी तकनीक इसी तरह भाषा के आड़े आएगी? आम लोगों में इस बात को लेकर जबरदस्त असंतोष है कि सरकारी सॉफ्टवेयर की गलती का खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ रहा है।
बुजुर्ग मतदाताओं के लिए सुनवाई केंद्र तक पहुंचना और दशकों पुराने दस्तावेजों के जरिए नाम की सही वर्तनी साबित करना एक बड़ी मानसिक और शारीरिक चुनौती बन गया है। फिलहाल चुनाव आयोग के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह इस भाषाई और तकनीकी टकराव का कोई बीच का रास्ता निकाले। यदि जल्द ही स्पेलिंग सुधार के लिए कोई ऑटो-करेक्शन नीति नहीं अपनाई गई, तो मतदाता सूची के शुद्धिकरण का यह महाभियान विवादों की भेंट चढ़ सकता है।